Know Three Important Things Related To Children And Jobs – जानिए बच्चों की परवरिश व नौकरी से जुड़ी तीन अहम बातें

0
23


ख़बर सुनें

लॉकडाउन में स्कूल व दफ्तर बंद हैं। अभिभावकों को घर पर दफ्तर के काम और बच्चों की देखभाल में सामंजस्य बिठाना पड़ रहा है। यह सच्चाई सामने आई है कि बच्चों की परवरिश सिर्फ कामकाजी घंटों के बाद तक सीमित नहीं है। उन्हें पूरे समय माता-पिता की जरूरत होती है।

बच्चों का लालन-पालन लाइफस्टाइल चुनने जैसा नहीं है, बल्कि यह आदत में शुमार होना चाहिए। साथ ही, अभिभावक अकेले बच्चे की परवरिश नहीं कर सकता। इसमें नियोक्ताओं की भी अहम भूमिका होती है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

परवरिश 24 घंटे का काम

लंबे घंटों तक काम करने वालों को अतिरिक्त मानदेय व पदोन्नति का लाभ मिलता है। लेकिन, यह व्यवस्था बच्चों की परवरिश के अनुकूल नहीं है। इसी कारण महिलाएं पेशेवर जीवन में पिछड़ जाती हैं। मां बनते ही ज्यादा सैलेरी, पदोन्नति सपने जैसा हो जाता है।

हालांकि, जब पुरुष पैतृक अवकाश या कामकाज में रियायत चाहते हैं, तो उन्हें भी बदले रवैये का सामना करना पड़ता है। एक शोध में कई कंपनियों को समान बायोडाटा भेजे गए। इनमें से कुछ महिला उम्मीदवारों को पेरेंट-टीचर एसोसिएशन की सदस्य बताया गया।

नतीजे में अधिकतर महिलाओं को मां मानते हुए साक्षात्कार के बुलाया ही नहीं गया। एक अन्य शोध के अनुसार, जब भी कर्मचारियों ने पारिवारिक कारणों से काम में रियायत चाही, तो उन्हें अप्रत्यक्ष दंड भुगतना पड़ा।

  • परवरिश निजी नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी

विशेषज्ञों का कहना है कि नौकरीपेशा जीवन में परिवार के साथ समय बिताने को प्रोत्साहित नहीं किया जाता। बच्चों की देखभाल को निजी माना जाता है। जबकि बच्चे देश का भविष्य होते हैं। इनमें से कोई डॉक्टर, इंजीनियर, पायलट, उद्योगपति बनता है तो कोई कुछ और। उनसे सार्वजनिक हितों के काम होते हैं। 

कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में वर्कलाइफ लॉ सेंटर के निदेशक जोन विलियम्स का कहना है, जब कंपनी बच्चों की देखभाल के लिए छूट देती है, तो वह सामाजिक जिम्मेदारी निभा रही होती है। जब किसी कर्मचारी को परिवार के साथ बिताने का समय दिया जाए तो वह ज्यादा उत्पादक हो सकता है। नैतिकता का भाव भी ज्यादा दिखाई देगा। 

हरेक कर्मचारी को जीवन में प्राथमिकताएं तय करने का अधिकार है।अध्ययन…टी-कोशिकाएं घटने से गंभीर होती है हालत चिकित्सा, सुरक्षा जैसी आवश्यक सेवाओं से जुड़े अभिभावकों के लिए बच्चों की देखभाल चुनौतीपूर्ण हो गया है। इन माता या पिता में से कोई भी घर पर रुक सकता। अन्य पेशे वालेे अभिभावकों के लिए भी अकेले देखभाल मुश्किल है। यह दोहरी जिम्मेदारी है।

जानकारों का कहना है, वर्कप्लेस पर कर्मचारियों को ज्यादा पेशेवर दिखने के लिए जताना होता है कि या तो उनके बच्चे नहीं है या जिम्मेदारियों का दबाव नहीं हैं। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के मुताबिक, लॉकडाउन के बाद पेड लीव, अफोर्डेबल चाइल्ड केयर, व्यावहारिक शिफ्ट, काम के उचित घंटे और वर्क फ्रॉम होम की इजाजत दी जानी चाहिए। 

लॉकडाउन में स्कूल व दफ्तर बंद हैं। अभिभावकों को घर पर दफ्तर के काम और बच्चों की देखभाल में सामंजस्य बिठाना पड़ रहा है। यह सच्चाई सामने आई है कि बच्चों की परवरिश सिर्फ कामकाजी घंटों के बाद तक सीमित नहीं है। उन्हें पूरे समय माता-पिता की जरूरत होती है।

बच्चों का लालन-पालन लाइफस्टाइल चुनने जैसा नहीं है, बल्कि यह आदत में शुमार होना चाहिए। साथ ही, अभिभावक अकेले बच्चे की परवरिश नहीं कर सकता। इसमें नियोक्ताओं की भी अहम भूमिका होती है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

परवरिश 24 घंटे का काम

लंबे घंटों तक काम करने वालों को अतिरिक्त मानदेय व पदोन्नति का लाभ मिलता है। लेकिन, यह व्यवस्था बच्चों की परवरिश के अनुकूल नहीं है। इसी कारण महिलाएं पेशेवर जीवन में पिछड़ जाती हैं। मां बनते ही ज्यादा सैलेरी, पदोन्नति सपने जैसा हो जाता है।

हालांकि, जब पुरुष पैतृक अवकाश या कामकाज में रियायत चाहते हैं, तो उन्हें भी बदले रवैये का सामना करना पड़ता है। एक शोध में कई कंपनियों को समान बायोडाटा भेजे गए। इनमें से कुछ महिला उम्मीदवारों को पेरेंट-टीचर एसोसिएशन की सदस्य बताया गया।

नतीजे में अधिकतर महिलाओं को मां मानते हुए साक्षात्कार के बुलाया ही नहीं गया। एक अन्य शोध के अनुसार, जब भी कर्मचारियों ने पारिवारिक कारणों से काम में रियायत चाही, तो उन्हें अप्रत्यक्ष दंड भुगतना पड़ा।

  • परवरिश निजी नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here